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सीट शेयरिंग विवाद: क्या महागठबंधन की एकजुटता पर संकट मंडरा रहा है? एनडीए को घेरने के चक्कर में तेजस्वी कहीं खुद तो नहीं फंस रहे!

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बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की जंग जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे महागठबंधन (इंडिया गठबंधन) के भीतर सीट बंटवारे को लेकर तनाव बढ़ता जा रहा है। नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के साथ ही यह साफ हो गया है कि गठबंधन के भीतर समन्वय की कमी और आपसी मतभेद चुनावी रणनीति को कमजोर कर रहे हैं। एनडीए को सत्ता से बाहर करने के सपने के बीच महागठबंधन अपनी ही उलझनों में फंसा नजर आ रहा है।

1. सीट शेयरिंग पर सहमति नहीं, कार्यकर्ताओं में असमंजस

बिहार की 243 विधानसभा सीटों पर जहां एनडीए ने सटीक रणनीति के साथ उम्मीदवार तय कर दिए हैं, वहीं महागठबंधन ने 254 उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं। खास बात यह है कि 11 सीटों पर दो-दो उम्मीदवार गठबंधन से ही ताल ठोक रहे हैं। वैशाली, कहलगांव, लालगंज, राजापाकर और रोसड़ा जैसी सीटों पर कांग्रेस और आरजेडी के बीच सीधी टक्कर देखने को मिलेगी। बछवाड़ा में कांग्रेस बनाम सीपीआई की लड़ाई होगी। इससे कार्यकर्ताओं में भ्रम की स्थिति है और यह असंतोष एनडीए के लिए फायदे का सौदा साबित हो सकता है।

2. घटती ऊर्जा और टूटता संवाद

एक समय राहुल गांधी की ‘वोट अधिकार यात्रा’ के दौरान जो उत्साह महागठबंधन के नेताओं में नजर आ रहा था, अब वह जोश ठंडा पड़ गया है। आरजेडी और कांग्रेस के बीच बातचीत लगभग ठप है। अब तक यह भी तय नहीं हो पाया है कि किस पार्टी के बड़े नेता किसके उम्मीदवारों के समर्थन में प्रचार करेंगे। वहीं एनडीए की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह और नीतीश कुमार जैसी हस्तियों की रैलियां पूरे जोश के साथ शुरू हो चुकी हैं।

3. उम्मीदवारों का गणित और प्रचार में दूरी

महागठबंधन में आरजेडी 143, कांग्रेस 61, सीपीआई-एमएल 20, सीपीआई 9, सीपीएम 4, वीआईपी 15 और आईपी गुप्ता की पार्टी 3 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। लेकिन सितंबर के बाद से राहुल गांधी और तेजस्वी यादव की साझा रैली नहीं हुई है। शुरुआत में मल्लिकार्जुन खरगे ने कुछ सभाएं की थीं, पर अब वे भी पीछे हट चुके हैं। इस दूरी से गठबंधन की एकता पर सवाल उठ रहे हैं।

4. प्रियंका गांधी की गैरमौजूदगी से कांग्रेस कमजोर

कांग्रेस ने इस बार महिला वोटरों पर फोकस रखा था, और इसका नेतृत्व खुद प्रियंका गांधी कर रही थीं। मगर सीट बंटवारे को लेकर पैदा हुए गतिरोध के बाद उन्होंने 24 सितंबर को पश्चिम चंपारण में आखिरी रैली की और तब से चुनावी मंच से गायब हैं। पार्टी ने हर प्रमंडल में एक रैली करने की योजना बनाई थी, पर अब वह कार्यक्रम भी ठंडे बस्ते में है। इससे कांग्रेस का ग्राउंड कनेक्शन कमजोर पड़ता दिख रहा है।

5. बाहरी सहयोगियों की भूमिका पर भी असमंजस

महागठबंधन की योजना थी कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और सपा प्रमुख अखिलेश यादव जैसे नेता भी बिहार में प्रचार करेंगे। मगर अब सीट विवाद और अंदरूनी खींचतान की वजह से यह योजना भी अधर में लटक गई है। नतीजतन, गठबंधन अपनी गति खोता नजर आ रहा है जबकि एनडीए ने अपने प्रचार अभियान को पूरे जोश से आगे बढ़ा दिया है।

निष्कर्ष:
महागठबंधन के भीतर जारी सीट शेयरिंग विवाद ने उसकी एकजुटता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एनडीए के खिलाफ साझा रणनीति बनाने के बजाय सहयोगी दल आपस में ही उलझे दिख रहे हैं। ऐसे में बिहार की सियासत में यह सवाल जोर पकड़ रहा है — क्या सीट बंटवारे की यह खींचतान महागठबंधन को चुनावी दौड़ से बाहर कर देगी?

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