बिहार में पहले चरण के चुनाव संपन्न होने के बाद अब पूरा राजनीतिक फोकस दूसरे चरण पर आ गया है। इस चरण में कुल 1302 प्रत्याशी मैदान में हैं, जिनकी किस्मत का फैसला करोड़ों मतदाता करेंगे। एनडीए, महागठबंधन और अन्य दलों ने अपने सभी बड़े नेताओं को प्रचार में झोंक दिया है। जहां एक ओर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जोड़ी एनडीए की तरफ से मोर्चा संभाले हुए हैं, वहीं दूसरी ओर तेजस्वी यादव, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और वामदलों के नेता मिलकर संयुक्त प्रचार कर रहे हैं।
दूसरे चरण में गयाजी, कैमूर, रोहतास, औरंगाबाद, अरवल, जहानाबाद, नवादा, भागलपुर, बांका, जमुई, सीतामढ़ी, शिवहर, मधुबनी, सुपौल, पूर्णिया, अररिया, कटिहार, किशनगंज, पूर्वी और पश्चिमी चंपारण शामिल हैं। इन जिलों की 122 सीटों पर मतदान होगा। इस चरण में एक तरफ सीमांचल की मुस्लिम बहुल सीटें हैं, तो दूसरी ओर मिथिलांचल और चंपारण की जातीय रूप से विभाजित सीटें भी निर्णायक भूमिका निभाएंगी।
गया जिले की 10 सीटों में बोधगया, शेरघाटी, वजीरगंज और अतरी जैसी सीटें इस बार बेहद दिलचस्प मुकाबले के केंद्र में हैं। कैमूर की 4, रोहतास की 7 और औरंगाबाद की 6 सीटों पर एनडीए और महागठबंधन में सीधा टकराव दिखाई दे रहा है। जहानाबाद, अरवल और नवादा जैसे इलाकों में जातीय समीकरण और उम्मीदवारों की लोकप्रियता दोनों बड़े कारक बनेंगे। भागलपुर, बांका और जमुई क्षेत्र की 16 सीटों पर भी त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिल सकता है।
मिथिलांचल की मधुबनी, सुपौल, सीतामढ़ी और शिवहर की 24 सीटों में इस बार स्थानीय मुद्दे जैसे रोजगार, बाढ़ नियंत्रण और शिक्षा व्यवस्था प्रमुख हैं। वहीं सीमांचल के अररिया, कटिहार, पूर्णिया और किशनगंज की 24 सीटें AIMIM के लिए अस्तित्व की परीक्षा साबित होंगी। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ने 2020 के चुनाव में इसी क्षेत्र से पांच सीटें जीतकर सबको चौंकाया था। इस बार भी AIMIM करीब 19 सीटों पर मुकाबले में है। हालांकि RJD और कांग्रेस इस बार इन सीटों को दोबारा अपने कब्जे में लेने के लिए पूरी ताकत लगा रही हैं।
पूर्वी चंपारण और पश्चिमी चंपारण की 21 सीटें बीजेपी के लिए निर्णायक हैं। 2020 में बीजेपी ने इस क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन किया था, लेकिन इस बार पार्टी को महागठबंधन की एकजुटता से कड़ी चुनौती मिल रही है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जदयू के लिए इस चरण में प्रदर्शन बेहद अहम रहेगा, क्योंकि पहले चरण में पार्टी को अपेक्षित बढ़त नहीं मिल पाई थी। वहीं चिराग पासवान की पार्टी एलजेपी(रामविलास) और जीतनराम मांझी की पार्टी एचएएम (सेक्युलर) भी अपनी-अपनी सीटें बचाने की जद्दोजहद में हैं।
इस बार चुनाव प्रचार में जातीय और धार्मिक समीकरणों के साथ-साथ विकास और रोजगार के मुद्दे भी खूब उछले। प्रधानमंत्री मोदी ने सभाओं में अपने विकास कार्यों और केंद्र सरकार की योजनाओं का हवाला दिया, तो तेजस्वी यादव ने ‘नौकरी, पढ़ाई और दवाई’ के नारे के साथ जनता को लुभाने की कोशिश की। महिला मतदाताओं को लेकर भी सभी दलों ने विशेष अभियान चलाए हैं।
प्रशासन की ओर से मतदान को शांतिपूर्ण और निष्पक्ष कराने की तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। सीमांचल और चंपारण के कुछ जिलों में सुरक्षा बलों की अतिरिक्त तैनाती की गई है। निर्वाचन आयोग ने मतदाता जागरूकता कार्यक्रम तेज कर दिए हैं ताकि अधिक से अधिक लोग अपने वोट का इस्तेमाल करें।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि दूसरे चरण का परिणाम यह तय करेगा कि सत्ता की राह पर किस गठबंधन की बढ़त बनेगी। अगर NDA ने यहां अच्छा प्रदर्शन किया तो उसे तीसरे चरण से पहले मनोबल बढ़ेगा, लेकिन अगर महागठबंधन ने बढ़त बनाई तो यह चुनाव का समीकरण पूरी तरह पलट सकता है। कुल मिलाकर बिहार चुनाव 2025 का दूसरा चरण सियासी शतरंज का सबसे रोमांचक और निर्णायक पड़ाव बन चुका है।



