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लोकसभा में चुनाव सुधार पर जोरदार बहस: अमित शाह-राहुल गांधी आमने-सामने, विपक्ष का वॉकआउट

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लोकसभा में बुधवार को चुनाव सुधार के मसले पर गरमागरम बहस हुई, जिसमें गृह मंत्री अमित शाह और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के बीच तीखी नोंक-झोंक देखने को मिली। इस बहस के दौरान राहुल गांधी ने एसआईआर (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) प्रक्रिया को ‘वोट चोरी’ करार दिया, जबकि अमित शाह ने इसे लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए ज़रूरी मानते हुए विपक्ष पर आरोप लगाया कि वे झूठ फैला कर देश की जनता को गुमराह कर रहे हैं। इस बीच, विपक्षी सांसदों ने अमित शाह के भाषण के दौरान सदन से वॉकआउट कर अचानक विरोध जताया। यह बहस चुनाव सुधार के बहुचर्चित मुद्दे पर विभिन्न राजनीतिक दलों की समीकरण और उनके मतभेदों की गहराई को सामने लेकर आई।

राहुल गांधी के आरोप: वोट चोरी और चुनाव आयोग पर सवाल

मंगलवार को लोकसभा में चुनाव सुधार चर्चा के दौरान राहुल गांधी ने केंद्रीय चुनाव आयोग और केंद्र सरकार पर ‘वोट चोरी’ का गंभीर आरोप लगाया था। उन्होंने विशेष रूप से हरियाणा विधानसभा चुनाव में फर्जी वोटरों के कथित आंकड़े पेश करते हुए कहा था कि ब्राजील की एक महिला का नाम हरियाणा की वोटर लिस्ट में 22 बार शामिल है। ऐसे ही एक महिला का नाम एक ही निर्वाचन क्षेत्र में 200 से अधिक बार दर्ज था। राहुल गांधी ने कहा कि ये स्पष्ट रूप से चुनाव चोरी को एक उदाहरण हैं, जिसे उन्होंने ‘बिना किसी शक के साबित’ किया है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने उनकी इन गंभीर शिकायतों और सवालों का जवाब नहीं दिया।

राहुल गांधी ने बिहार में हुई एसआईआर प्रक्रिया को उदाहरण बनाते हुए कहा कि वहां 1.2 लाख डुप्लीकेट फोटोज़ अभी भी वोटर लिस्ट में मौजूद हैं। उनका तर्क था कि अगर वोटर सूची को सही तरीके से शुद्ध किया गया होता तो ऐसा नहीं होना चाहिए था। अपने संबोधन के अंत में उन्होंने कहा कि वोट चोरी सबसे बड़ा एंटी-नेशनल काम है क्योंकि इससे देश की लोकतांत्रिक बुनियाद कमजोर होती है।

अमित शाह का जवाब और कांग्रेस पर हमला

गृह मंत्री अमित शाह ने राहुल गांधी की इन बातों का कड़ा जवाब देते हुए कहा कि एसआईआर मूलतः मतदाता सूची का शुद्धीकरण प्रक्रिया है, जिसका मकसद मृतकों के नाम काटना, 18 वर्ष से ऊपर के नए मतदाताओं का नाम जोड़ना, दोहरी मतदाता सूची को ठीक करना और विदेशी नागरिकों के नाम हटाना है। उन्होंने कहा कि कोई भी लोकतंत्र इस स्थिति में सुरक्षित नहीं रह सकता जहां प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री ‘घुसपैठियों’ द्वारा चुने जाएं। इसलिए एसआईआर की मेहनत कुछ दलों के राजनीतिक स्वार्थ पर चोट पहुंचा रही है। इसके साथ ही अमित शाह ने राहुल गांधी की हरियाणा के एक आवास पर 501 मतों के आरोप पर चुनाव आयोग की सफाई का हवाला देते हुए इस तथ्य को भी खारिज किया।

अमित शाह ने सदन में कहा, “विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने पांच नवंबर 2025 को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में ‘परमाणु बम’ फोड़ा था, लेकिन चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि हाउस नंबर 265 एक बड़ा परिवारिक प्लॉट है, न कि फर्जी मतदाता।” इसके जवाब में राहुल गांधी ने खड़े होकर अमित शाह को अपनी तीन प्रेस कॉन्फ्रेंसों पर बहस का आमंत्रण दिया, जिससे सदन में हलचल मच गई।

इसपर अमित शाह ने फटकार लगाई कि वे ही यह तय करें कि उन्हें बोलना कब और कैसे है, संसद में ऐसा व्यवहार स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने कहा, “मैं 30 साल से जनप्रतिनिधि हूं, संसदीय प्रणाली का अनुभव है, मुझे यह नहीं बताया जाएगा कि मैं कब बोलूं।” इसके बाद बहस के बीच उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी का हवाला देते हुए कहा कि देश के पहले प्रधानमंत्री के चुनाव में भी वोटिंग घपला हुआ था। उन्होंने कहा कि नेहरू को मात्र दो वोट मिले थे जबकि सरदार पटेल को 28, लेकिन नेहरू प्रधानमंत्री बने।

विपक्ष का वॉकआउट और अमित शाह का तीखा जवाब

अमित शाह के इस बयान के बाद हंगामा बढ़ गया और राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी सांसद सदन से वॉकआउट कर गए। इसके बाद अमित शाह ने कहा कि विपक्षी सांसद घुसपैठियों को बाहर निकालने की बात कर रहे हैं, लेकिन सवाल आने पर संसद से भाग जाते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार की नीति है- ‘डिटेक्ट करो, नाम काटो और डिपोर्ट करो’। अमित शाह के इस कड़े तेवर से साफ था कि सरकार इस मुद्दे पर अपना कोई समझौता करने को तैयार नहीं है।

अखिलेश यादव का विरोध

इस संवेदनशील मसले पर अन्य विपक्षी नेता भी सक्रिय हुए। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि सरकार एसआईआर के नाम पर ‘एनआरसी’ लागू कर रही है। उन्होंने चेतावनी दी कि जो लोग आज हटा दिए गए उन्हें बाद में ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) वोटर के तौर पर निशाना बनाया जाएगा। उन्होंने कहा कि अगर वोटर नहीं रहेंगे तो राशन कार्ड और आरक्षण जैसी सामाजिक सुरक्षा भी खतरे में पड़ जाएगी।

बीजेपी के पूर्व कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने भी इस बहस में हिस्सा लिया। उन्होंने चुनाव आयुक्तों के चयन प्रक्रिया और न्यायपालिका की भूमिका पर अपनी राय दी, यह सवाल उठाते हुए कि क्या हर मामले में न्यायपालिका को शामिल करना ‘सेपरेशन ऑफ पावर’ के खिलाफ नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र के लिए यह जरूरी है कि चुनाव आयुक्तों का चयन प्रक्रिया पारदर्शी और संतुलित हो, जिसमें कई पक्ष शामिल हों।

चुनाव सुधार बहस से जुड़े मुद्दे

स्‍पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) चुनाव आयोग की एक प्रक्रिया है, जो मतदाता सूची से दोहरी प्रविष्टियों, मृतकों, विदेशी नागरिकों और अवैतनिक नामों को हटाने के लिए लागू की जाती है। इस प्रक्रिया को लेकर कई राज्यों में यह चर्चा और विवाद हुआ है कि कहीं यह प्रक्रिया राजनीतिक रूप से दुरुपयोग न हो। विपक्ष इस प्रक्रिया को वोटरों को हटाने और उनके अधिकारों पर चोट पहुँचाने वाली कार्रवाई बताता रहा है। वहीं सरकार इसे लोकतंत्र की मजबूती का अहम हिस्सा मानती है।

निष्कर्ष

लोकसभा में चुनाव सुधार के मुद्दे पर हुई इस बहस ने राजनीतिक दलों के मतभेद और रणनीतियों को फिर से उजागर किया है। विपक्षी दलों ने चुनाव सुधार को एक संवेदनशील मुद्दा बनाकर सरकार की नीतियों पर सवाल खड़े किए हैं, वहीं सरकार ने इसे लोकतंत्र की सुरक्षा और व्यवस्था सुधार की आवश्यकता बताया है। बहस के दौरान राहुल गांधी और अमित शाह के बीच संवाद का टकराव काफी तीव्र था, जिसने सदन की कार्यवाही को प्रभावित किया और विपक्ष के वॉकआउट तक मामला चला गया।

यह बहस आगामी चुनाव सुधार और मतदाता सूची की पारदर्शिता को लेकर देश की राजनीतिक परिदृश्य में एक नया मोड़ साबित हो सकती है। आने वाले समय में इस मुद्दे पर और ज़्यादा राजनीतिक चर्चाएँ और संभावित सुधार देखने को मिल सकते हैं।

Correspondent – Shanwaz khan

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