दुनिया में एक ऐसा देश है, जिसके पास परमाणु बम बनाने का सबसे बड़ा कच्चा माल—यूरेनियम—का भंडार है, फिर भी उसने कभी एटम बम नहीं बनाया। यह देश है ऑस्ट्रेलिया। वैश्विक यूरेनियम भंडार का 28-30% (लगभग 1.68 से 1.95 मिलियन टन) यहीं है। दक्षिण ऑस्ट्रेलिया की ओलंपिक डैम खदान दुनिया की सबसे बड़ी डिपॉजिट है। इतना संसाधन होने पर भी ऑस्ट्रेलिया ने न्यूक्लियर हथियारों से दूरी बनाए रखी। आइए जानें इसके पीछे की प्रमुख वजहें।
सबसे बड़ा कारण है अंतरराष्ट्रीय संधियां। 1973 में ऑस्ट्रेलिया ने न्यूक्लियर नॉन-प्रोलिफरेशन ट्रीटी (NPT) को मंजूरी दी। यह ट्रीटी देश को कानूनी रूप से न्यूक्लियर हथियार बनाने या हासिल करने से रोकती है। साथ ही, यूरेनियम का उपयोग केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों—जैसे बिजली उत्पादन—के लिए अनुमत है। इसके अलावा, राराटोंगा ट्रीटी के तहत ऑस्ट्रेलिया दक्षिण प्रशांत क्षेत्र को न्यूक्लियर हथियार मुक्त रखने का हस्ताक्षरकर्ता है।
ऑस्ट्रेलिया में कोई न्यूक्लियर पावर प्लांट नहीं है। सारा यूरेनियम कड़े अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों के साथ निर्यात किया जाता है, मुख्यतः सिविलियन ऊर्जा के लिए। इससे देश खुद न्यूक्लियर फ्यूल चक्र से दूर रहता है। कानूनी रूप से न्यूक्लियर बिजली उत्पादन प्रतिबंधित है। जनता की एंटी-न्यूक्लियर भावना भी मजबूत है—दशकों से विरोध प्रदर्शन और जनमत ने नीतियों को प्रभावित किया।
रणनीतिक दृष्टि से ऑस्ट्रेलिया को खुद बम बनाने की जरूरत नहीं। यह अमेरिका के साथ सुरक्षा गठबंधन (ANZUS) पर निर्भर है, जो ‘न्यूक्लियर अम्ब्रेला’ प्रदान करता है। यानी, खतरे में अमेरिका की न्यूक्लियर शक्ति सुरक्षा देगी। इससे ऑस्ट्रेलिया बिना हथियार बनाए सुरक्षित रहता है।
यह नीति न केवल शांति को बढ़ावा देती है, बल्कि ऑस्ट्रेलिया को वैश्विक यूरेनियम निर्यातक के रूप में आर्थिक लाभ भी दिलाती है। क्या यह मॉडल अन्य देशों के लिए प्रेरणा है? समय बताएगा।
Correspondent – Shanwaz Khan



