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लोकसभा स्पीकर ओम बिरला पर विपक्ष का अविश्वास: 120 सांसदों का नोटिस, लेकिन इतिहास कहता है—कभी हटाया नहीं गया!

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नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पद से हटाने के लिए विपक्ष ने बड़ा कदम उठाया। मंगलवार (10 फरवरी 2026) को कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, DMK समेत 120 सांसदों ने हस्ताक्षरित नोटिस लोकसभा महासचिव को सौंपा। टीएमसी के 28 सांसदों ने अब तक समर्थन नहीं दिया। यह नोटिस स्पीकर के कथित पक्षपातपूर्ण रवैये के खिलाफ है। हालांकि, इतिहास गवाह है कि लोकसभा स्पीकर को कभी हटाया नहीं गया। अब तक तीन औपचारिक प्रयास हुए, सभी विफल रहे। क्या यह चौथा प्रयास सफल होगा?

संवैधानिक प्रावधान: 50 सांसदों का समर्थन, साधारण बहुमत जरूरी
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 94 के तहत लोकसभा अध्यक्ष या उपाध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए कम से कम 50 सांसदों का समर्थन अनिवार्य है। नोटिस महासचिव को दिया जाता है, जिसमें स्पीकर के खिलाफ विशिष्ट आरोप होने चाहिए। जांच के बाद सदन में चर्चा होती है, फिर साधारण बहुमत (कुल सदस्यों का आधा से अधिक) से पारित होना चाहिए। अनुच्छेद 96 स्पष्ट करता है कि प्रस्ताव विचाराधीन रहते स्पीकर अध्यक्षता नहीं कर सकते—उपाध्यक्ष या वरिष्ठ सदस्य पीठासीन होते हैं। पूर्व महासचिव पीडीटी आचारी के मुताबिक, “बहुमत सभी सदस्यों की गिनती से तय होता है, उपस्थित सदस्यों से नहीं। स्पीकर को अपना बचाव का पूर्ण अधिकार है।”

इतिहास के तीन असफल प्रयास: कोई स्पीकर पद से नहीं हटा
लोकसभा के 75 वर्षों में स्पीकर हटाने का कोई प्रस्ताव सफल नहीं हुआ। पहला मामला 1954 का: प्रथम स्पीकर जी.वी. मावलंकर के खिलाफ समाजवासी नेता नाथुराम खत्री ने प्रस्ताव लाया। आरोप थे सदन प्रबंधन में निष्पक्षता की कमी। चर्चा हुई, लेकिन समर्थन न मिलने से गिर गया। दूसरा, 1966: सरदार हुकम सिंह के खिलाफ समाजवादी माधु लिमये का प्रस्ताव। नेहरू युग के बाद इंदिरा गांधी के उदय के दौर में यह आया। बहस लंबी चली, पर बहुमत न बना। तीसरा, 1987: बलराम जाखड़ के खिलाफ सीपीएम के सोमनाथ चटर्जी (बाद में स्पीकर बने) ने प्रस्ताव पेश किया। बोफोर्स कांड के समय का यह मामला विवादास्पद रहा, लेकिन राजीव गांधी सरकार के बहुमत ने इसे खारिज कर दिया। इनके अलावा असंख्य अनौपचारिक मांगें हुईं, जैसे 1975 आपातकाल में स्पीकर के खिलाफ कांग्रेस आंतरिक विद्रोह, लेकिन औपचारिक नोटिस तक नहीं पहुंचा।

वर्तमान नोटिस: जांच के बाद कार्रवाई, NDA का मजबूत बहुमत
पीटीआई सूत्रों के अनुसार, नोटिस की प्रारंभिक जांच होगी—विशिष्ट आरोपों की पड़ताल। 120 हस्ताक्षर संवैधानिक न्यूनतम (50) से अधिक हैं, लेकिन लोकसभा में NDA के 293 सांसद हैं (कुल 543 में), जबकि विपक्ष के 230। बहुमत गणना में खाली सीटें भी गिनी जाती हैं, इसलिए सफलता मुश्किल। विपक्ष का आरोप: बिरला ने विपक्षी सांसदों के सवाल दबाए, बहस रोकी। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा, “लोकतंत्र की रक्षा जरूरी।” वहीं, भाजपा ने इसे “राजनीतिक स्टंट” बताया।

स्पीकर की भूमिका और परंपराएं
स्पीकर सदन का संरक्षक होता है, जो निष्पक्षता की मिसाल बनता है। ब्रिटिश संसदीय परंपरा से प्रेरित, भारत में स्पीकर आमतौर पर सत्तापक्ष से चुने जाते हैं, लेकिन इस्तीफा देकर निष्पक्ष रहते हैं। आचारी ने जोड़ा, “प्रस्ताव चर्चा का माध्यम बन सकता है, लेकिन हटाना दुर्लभ।” राज्यसभा में उपसभापति केसरीनाथ त्रिपाठी (भाजपा) भी विपक्ष के निशाने पर रहे, लेकिन कोई औपचारिक कदम नहीं।

आगे क्या?
नोटिस पर लोकसभा सचिवालय 48 घंटे में फैसला लेगा। यदि स्वीकार, 10-14 दिनों में चर्चा। विपक्ष की एकजुटता (INDIA गठबंधन) परीक्षा होगी। इतिहास दोहराएगा या नया अध्याय बनेगा? लोकतंत्र की इस जंग पर नजरें टिकी हैं।

Correspondent – Shanwaz Khan

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