महाराष्ट्र महानगरपालिका चुनाव 2026 के मतदान से ठीक पहले राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) को बड़ा झटका लगा है. बॉम्बे हाई कोर्ट ने निर्विरोध चुने गए उम्मीदवारों को लेकर दायर मनसे की याचिका को खारिज कर दिया है. इस फैसले के बाद चुनावी माहौल में सियासी हलचल और तेज हो गई है.
यह याचिका मनसे नेता अविनाश जाधव की ओर से दाखिल की गई थी. उन्होंने आरोप लगाया था कि नगर निगम चुनावों में कई उम्मीदवारों को पैसे और सत्ता के प्रभाव के कारण निर्विरोध विजेता घोषित कर दिया गया. जाधव का कहना था कि यह पूरी प्रक्रिया लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है और इससे चुनाव की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं.
याचिका में दावा किया गया था कि महाराष्ट्र के विभिन्न महानगरपालिकाओं में करीब 67 उम्मीदवार बिना किसी मुकाबले के निर्वाचित घोषित कर दिए गए हैं. मनसे का आरोप था कि इनमें से अधिकांश प्रत्याशी सत्ताधारी दल से जुड़े हुए हैं. पार्टी ने इसे चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सीधा हमला बताया और इसे लोकतंत्र के लिए खतरा करार दिया.
मनसे ने हाई कोर्ट से मांग की थी कि इन निर्विरोध चुने गए उम्मीदवारों के मामलों की जांच हाई कोर्ट के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश से कराई जाए. इसके अलावा यह भी अनुरोध किया गया था कि जांच पूरी होने तक इन प्रत्याशियों को आधिकारिक रूप से विजेता घोषित न किया जाए. पार्टी का तर्क था कि जब तक पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता साबित नहीं होती, तब तक चुनाव परिणामों को मान्यता देना जल्दबाजी होगी.
हालांकि, बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए इसे खारिज कर दिया. कोर्ट का मानना था कि इस तरह के मामलों में चुनाव आयोग और संबंधित चुनावी प्रक्रिया पहले से ही नियमों के तहत काम करती है, और केवल आरोपों के आधार पर पूरी चुनावी व्यवस्था पर सवाल नहीं उठाया जा सकता. कोर्ट के इस फैसले के बाद मनसे की उम्मीदों को बड़ा झटका लगा है.
इस फैसले पर मनसे नेताओं ने नाराजगी जताई है. पार्टी का कहना है कि वह लोकतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए अपनी लड़ाई जारी रखेगी. वहीं, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मतदान से ठीक पहले आया यह फैसला मनसे की रणनीति और मनोबल दोनों पर असर डाल सकता है.
अब जबकि मतदान में 24 घंटे से भी कम समय बचा है, ऐसे में यह मुद्दा चुनावी बहस का अहम हिस्सा बन गया है. एक तरफ सत्ताधारी दल कोर्ट के फैसले को सही ठहरा रहा है, तो दूसरी ओर मनसे इसे जनता की आवाज दबाने का प्रयास बता रही है. आने वाले नतीजों में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस विवाद का मतदाताओं के फैसले पर कितना असर पड़ता है.
Corrospundent – Shanwaz khan



