पटना: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की सरगर्मी अब चरम पर है। पोस्टर, रैलियों और भाषणों के बीच अब हर ओर एक ही सवाल गूंज रहा है — इस बार बिहार की गद्दी किसके हाथ में जाएगी? इसी बीच, राजनीतिक विश्लेषक अमिताभ तिवारी ने हाल के छह से सात चुनावों (तीन विधानसभा और तीन लोकसभा) के नतीजों का तुलनात्मक अध्ययन जारी किया है, जिसमें बिहार की प्रमुख पार्टियों — जेडीयू, बीजेपी, राजद और कांग्रेस — की स्थिति को विस्तार से बताया गया है।
जेडीयू की स्थिति: संतुलन बिगड़ता दिख रहा है
जनता दल (यूनाइटेड) यानी जेडीयू के लिए इस बार का चुनाव आसान नहीं दिख रहा। अमिताभ तिवारी के मुताबिक, पार्टी की केवल 17 सीटें बहुत मजबूत श्रेणी में आती हैं, लेकिन इनमें से वह सिर्फ 6-7 पर ही जीत दर्ज कर पाई है। वहीं 31 मजबूत सीटों में भी पार्टी का प्रदर्शन कमजोर रहा और उसे सिर्फ 4-5 सीटों पर जीत मिली।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि जेडीयू की 116 सीटें मुश्किल श्रेणी में हैं — यानी जहां जीत पाना लगभग असंभव रहा है। इन सीटों पर पार्टी ने मुश्किल से एक या दो जीत दर्ज कीं। इतना ही नहीं, 45 कमजोर सीटों पर जेडीयू का खाता तक नहीं खुला। विश्लेषकों का मानना है कि लगातार गठबंधन बदलने और नेतृत्व की अस्थिरता ने पार्टी को नुकसान पहुंचाया है।
भाजपा का गणित: शहरी इलाकों तक सिमटती पकड़
भारतीय जनता पार्टी (BJP) की स्थिति भी जेडीयू जैसी ही दिख रही है। रिपोर्ट के अनुसार, भाजपा की 19 सीटें बहुत मजबूत श्रेणी में हैं, जिनमें से वह केवल 6-7 पर जीत पाई। 47 मजबूत सीटों में भी पार्टी का प्रदर्शन फीका रहा और उसे सिर्फ 4-5 सीटों पर जीत मिली।
भाजपा की 70 सीटें मुश्किल श्रेणी में और 63 सीटें कमजोर श्रेणी में हैं, जहां उसका प्रदर्शन उम्मीद से नीचे रहा। तिवारी के अनुसार, भाजपा का पारंपरिक वोट बैंक कई ग्रामीण क्षेत्रों में कमजोर हुआ है, खासकर उन इलाकों में जहां जनता गठबंधन की नीतियों से असंतुष्ट है।
राजद की बढ़त कायम
राष्ट्रीय जनता दल (राजद) अभी भी बिहार की सबसे स्थायी राजनीतिक ताकत के रूप में उभर रहा है। रिपोर्ट बताती है कि राजद की 16 मजबूत सीटें हैं, जिनमें से वह 4-5 पर लगातार जीत दर्ज करती आई है।
राजद की मध्यम श्रेणी की 16 सीटों में से भी पार्टी ने तीन पर जीत हासिल की। दिलचस्प बात यह है कि राजद की 116 मुश्किल सीटों में से भी उसने 1-2 पर जीत दर्ज की है। इससे साफ है कि लालू यादव और तेजस्वी यादव का पारंपरिक वोट बैंक, खासकर यादव-मुस्लिम इलाकों में, अब भी असरदार है। हालांकि, 93 कमजोर सीटों पर पार्टी का खाता नहीं खुला।
कांग्रेस और वामदल: सीमित प्रभाव, सीमित उम्मीदें
कांग्रेस की स्थिति बिहार में सबसे कमजोर मानी जा रही है। उसके पास कोई भी बहुत मजबूत सीट नहीं है। केवल 7 मध्यम सीटों में से उसने 3 पर जीत दर्ज की है, जबकि 44 मुश्किल सीटों में सिर्फ 1-2 पर जीत मिली। 189 कमजोर सीटों पर उसका प्रदर्शन शून्य रहा।
वहीं, वामदलों — भाकपा-माले और सीपीएम — की स्थिति भी लगभग समान है। दोनों दलों के पास कोई मजबूत आधार नहीं है। सीपीएम ने 11 मुश्किल सीटों में से 1-2 पर जीत हासिल की, जबकि 200 से अधिक कमजोर सीटों पर वह हार गई।
छोटे दलों की भूमिका हाशिए पर
लोजपा, हम, रालोसपा और वीआईपी जैसे छोटे दल इस चुनावी समीकरण में सीमित प्रभाव रखते हैं। लोजपा की 23 मध्यम सीटों में से सिर्फ 3 पर जीत दर्ज हुई। हम और रालोसपा की मुश्किल सीटों पर भी प्रदर्शन कमजोर रहा। वीआईपी पार्टी, जो पहले एनडीए और अब महागठबंधन का हिस्सा है, अपनी 5 कठिन सीटों में से केवल 1-2 पर ही जीत पाई।
उत्तर बनाम दक्षिण बिहार: दो अलग राजनीतिक तस्वीरें
अमिताभ तिवारी ने बिहार को दो हिस्सों में विभाजित कर विश्लेषण किया है। उत्तर बिहार में जेडीयू और राजद की पकड़ अपेक्षाकृत मजबूत है, जबकि दक्षिण बिहार में भाजपा का प्रभाव कुछ अधिक है।
उत्तर बिहार में जेडीयू की 12 बहुत मजबूत सीटें हैं (6-7 जीत के साथ), वहीं राजद ने यहां 16 में से 6-7 सीटों पर जीत दर्ज की है। दक्षिण बिहार में भाजपा की पकड़ शहरी केंद्रों तक सीमित है, जबकि राजद का असर ग्रामीण क्षेत्रों में घटा है।



