पटना/सारण:
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में मढ़ौरा सीट पर मुकाबला बेहद दिलचस्प हो गया है। इस पारंपरिक राजनीतिक गढ़ में इस बार लोजपा(रामविलास) के नेता चिराग पासवान ने भोजपुरी फिल्मों की मशहूर एक्ट्रेस सीमा सिंह को मैदान में उतारकर चुनावी समीकरणों को रोमांचक बना दिया है। वहीं, मौजूदा विधायक और मंत्री जितेंद्र कुमार राय (राजद) अपनी सीट बचाने की चुनौती का सामना कर रहे हैं। इसके अलावा जनसुराज आंदोलन से जुड़े अभय सिंह भी मैदान में हैं, जो इस त्रिकोणीय मुकाबले को और अधिक दिलचस्प बना रहे हैं।
राजनीतिक विरासत और मढ़ौरा की पहचान
मढ़ौरा विधानसभा क्षेत्र (सारण जिला) को राष्ट्रीय जनता दल (राजद) का मजबूत गढ़ माना जाता है। इस क्षेत्र में यादव परिवार की पकड़ दशकों से कायम रही है। यदुवंशी राय ने 1995 और 2000 में राजद के टिकट पर जीत हासिल कर पार्टी की नींव मजबूत की थी। उनके निधन के बाद उनके पुत्र जितेंद्र कुमार राय ने इस राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाया और 2010, 2015 व 2020 में लगातार जीत दर्ज की। 2022 में नीतीश कुमार मंत्रिमंडल में उन्हें मंत्री पद से भी नवाजा गया।
मढ़ौरा की जनता अब यह देखने को उत्सुक है कि क्या इस बार चिराग पासवान की नई रणनीति और सीमा सिंह का ग्लैमर फैक्टर इस पारंपरिक समीकरण को बदल पाएगा या नहीं।
चिराग का दांव – सिनेमा से सियासत तक
भोजपुरी सिनेमा की लोकप्रिय अभिनेत्री सीमा सिंह को टिकट देकर चिराग पासवान ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि लोजपा(आर) अब युवाओं और महिलाओं को भी सक्रिय राजनीति में लाना चाहती है। सीमा सिंह का क्षेत्र में काफी जनसंपर्क और लोकप्रियता है, जो लोजपा(आर) के लिए एक नया वोट बैंक तैयार कर सकती है। चिराग खुद कई बार कह चुके हैं कि उनकी पार्टी नई सोच और नई राजनीति की प्रतीक है।
वहीं, जनसुराज से अभय सिंह भी अपने संगठन और क्षेत्रीय मुद्दों के साथ जनता के बीच पहुंच बना रहे हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि तीनों उम्मीदवारों में किसका जनसमर्थन ज्यादा प्रभावी रहता है।
औद्योगिक गौरव की भूमि
मढ़ौरा सिर्फ राजनीति ही नहीं, बल्कि अपने औद्योगिक इतिहास के लिए भी जाना जाता है। कभी यहां की मॉर्टन चॉकलेट फैक्ट्री देशभर में प्रसिद्ध थी। 1929 में शुरू हुई इस फैक्ट्री में चॉकलेट, टॉफी और कुकीज़ बनती थीं, जिससे हजारों लोगों को रोजगार मिला था। हालांकि 1997 में बुनियादी ढांचे की कमी और श्रम विवादों के चलते यह फैक्ट्री बंद हो गई।
आज मढ़ौरा का औद्योगिक गौरव फिर से चर्चा में है, क्योंकि यहां के कारखाने में बने रेल डीजल इंजन हाल ही में गिनी गणराज्य भेजे गए हैं। यह ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत भारत की तकनीकी प्रगति का प्रतीक है और बिहार के लिए गौरव का विषय है।
धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत
मढ़ौरा धार्मिक रूप से भी समृद्ध है। यहां का शिल्हौरी मंदिर शिवपुराण और रामचरितमानस में वर्णित है। कहा जाता है कि यही वह स्थान है जहां देवर्षि नारद का मोहभंग हुआ था। हर शिवरात्रि पर यहां विशाल मेला लगता है, जिसमें देशभर से श्रद्धालु बाबा शिलानाथ के दर्शन करने आते हैं।
इसके अलावा मां गढ़देवी शक्तिपीठ भी इस क्षेत्र का प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है। मान्यता है कि सती माता के रक्त की बूंदें यहां गिरी थीं, जिससे यह स्थान शक्ति स्थल के रूप में विख्यात हुआ। चैत्र नवरात्र और दुर्गा पूजा के समय यहां लाखों श्रद्धालु उमड़ते हैं।
मढ़ौरा का एक मध्ययुगीन किला भी अपनी प्राचीनता और स्थापत्य के लिए प्रसिद्ध है, जो इस क्षेत्र की ऐतिहासिक धरोहर को जीवंत रखता है।
निष्कर्ष
इस बार मढ़ौरा में चुनावी जंग सिर्फ नेताओं की नहीं, बल्कि परंपरा, ग्लैमर और विकास के बीच का संघर्ष बन चुकी है।
एक ओर राजद की पुरानी जड़ें और जीतेंद्र राय की छवि है, वहीं दूसरी ओर चिराग पासवान का नया दांव और सीमा सिंह की लोकप्रियता। नतीजे जो भी हों, लेकिन यह तय है कि मढ़ौरा की सियासत इस बार पूरे बिहार की निगाहों में रहेगी।



