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LPG सिलेंडर संकट: अमेरिका-ईरान जंग ने रसोई रोकी! पेट्रोल-डीजल की तरह LPG स्टोर क्यों नहीं कर पाते हम?

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नई दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच छिड़ी जंग को महज दो हफ्ते ही हुए हैं, लेकिन इसका असर भारत के करोड़ों घरों की रसोई तक पहुंच चुका है। शहरों-कस्बों में गैस एजेंसियों पर लंबी-लंबी कतारें लग रही हैं। होटल, रेस्तरां बंद हो रहे हैं, और घरेलू रसोईयों में चूल्हा ठंडा पड़ रहा है। लोग सवाल उठा रहे हैं- सरकार ने LPG की भंडारण व्यवस्था क्यों नहीं की? पेट्रोल-डीजल की तरह इसे स्टोर क्यों नहीं किया जा सका? आइए, इस संकट की जड़ें समझते हैं और जानते हैं कि LPG स्टोरेज की राह में क्या-क्या बाधाएं हैं।

सबसे पहले समझिए, कच्चा तेल स्टोर करना कितना आसान है। पेट्रोलियम को भूमिगत गड्ढों, विशाल ड्रमों या पाइपलाइनों में आसानी से रखा जा सकता है। भारत के पास 5 मिलियन टन से अधिक कच्चे तेल का रणनीतिक भंडार है, जो कई महीनों की जरूरत पूरी कर सकता है। लेकिन LPG (Liquefied Petroleum Gas) ऐसी ‘नखरीली’ गैस है, जिसे दबाव (प्रेशर) के तहत ही तरल रूप में रखा जाता है। सामान्य तापमान पर यह वाष्पीकृत हो जाती है, इसलिए विशेष प्रेशराइज्ड सिलेंडर, गोलाकार टैंक, माउंटेड स्टोरेज बुलेट्स या भूमिगत गुफाओं (रॉक कैवर्न्स) की जरूरत पड़ती है। इनकी निर्माण लागत बेहद ऊंची है- एक कैवर्न बनाने में अरबों रुपये लगते हैं। यही कारण है कि भारत में LPG स्टोरेज सीमित है।

भारत के पास फिलहाल मात्र दो प्रमुख भूमिगत स्टोरेज सुविधाएं हैं: विशाखापट्टनम (आंध्र प्रदेश) और मंगलुरु (कर्नाटक)। विशाखापट्टनम की कैवर्न क्षमता 60,000 टन और मंगलुरु की 80,000 टन है, कुल मिलाकर 1.4 लाख टन। भारत की दैनिक LPG खपत 25,000 टन से अधिक है (IOCL, HPCL, BPCL मिलाकर), यानी यह स्टॉक मुश्किल से 5-6 दिनों का ही बैकअप दे सकता है। वैश्विक तुलना में, अमेरिका के पास 100 मिलियन बैरल से अधिक LPG भंडार है, जबकि सऊदी अरब जैसी देशों में विशाल कैवर्न नेटवर्क हैं। भारत में कमी का मुख्य कारण लगातार आयात पर निर्भरता रही है- ईरान, कतर और UAE से 70% LPG आता है। जंग ने आपूर्ति चेन तोड़ दी, जिससे संकट गहरा गया।

इसके अलावा, देशभर में 200 से अधिक बॉटलिंग प्लांट्स हैं, जहां वर्टिकल-हॉरिजॉंटल बुलेट टैंक (कुल 5-6 लाख टन क्षमता) मौजूद हैं। रिफाइनरियों (जैसे रिलायंस जामनगर) में भी उत्पादन के साथ स्टोरेज होता है। ट्रकों, पाइपलाइनों और वितरण नेटवर्क में भी कुछ बफर स्टॉक है, लेकिन यह अपर्याप्त है। हर सरकार ने सस्ती उपलब्धता पर फोकस किया, स्टोरेज पर नहीं। नतीजा- 14 दिनों की जंग ने घर-घर को प्रभावित कर दिया।

सरकार अब सक्रिय हो रही है। पेट्रोलियम मंत्रालय ने गुजरात (कांडला), ओडिशा (पारादीप) और तमिलनाडु तटों पर नई रॉक कैवर्न्स के सर्वे शुरू कराए हैं। 2027 तक 5 लाख टन अतिरिक्त क्षमता का लक्ष्य है। अंतरिम उपायों में UAE, सऊदी से अतिरिक्त आयात और रिफाइनरी उत्पादन बढ़ाना शामिल है। प्रधानमंत्री ने आपात बैठक बुलाई, जिसमें सब्सिडी वाले सिलेंडरों की प्राथमिकता दी गई। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि LPG इंफ्रास्ट्रक्चर पर 50,000 करोड़ का निवेश जरूरी है।

यह संकट ऊर्जा सुरक्षा का सबक है। पाइपलाइन नेटवर्क (जैसे हजिरा-विजयपुर-जगदीशपुर) विस्तार और PNG (Piped Natural Gas) को बढ़ावा देकर निर्भरता कम की जा सकती है। फिलहाल, उपभोक्ताओं से अपील है- अनावश्यक बुकिंग न करें, ज stockpiling से बचें। जंग कब थमेगी, पता नहीं, लेकिन भारत को अब स्टोरेज पर जोर देना होगा ताकि रसोई कभी न रुके।

Correspondent – Shanwaz Khan

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