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लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव: ओम बिरला पर विपक्ष का निशाना, जानें इतिहास के प्रमुख मामले

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नई दिल्ली, 9 फरवरी 2026: लोकसभा में विपक्ष ने स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की पूरी तैयारी कर ली है। कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों का आरोप है कि स्पीकर ने सदन की कार्यवाही में पक्षपात किया, विपक्षी नेताओं को बोलने का पर्याप्त मौका नहीं दिया और महिला सांसदों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार किया। प्रस्ताव के लिए 100 सांसदों के हस्ताक्षर जुटाए जा रहे हैं। यदि लोकसभा सचिवालय इसे स्वीकार करता है, तो चर्चा होगी और स्पीकर पद पर खतरा मंडरा सकता है। आइए जानते हैं कि लोकसभा स्पीकर को हटाने के लिए अतीत में ऐसे प्रस्ताव कब-कब लाए गए।

सबसे पहला प्रयास: जी.वी. मावलंकर के खिलाफ (1954)
लोकसभा स्पीकर के खिलाफ पहला अविश्वास प्रस्ताव 18 दिसंबर 1954 को भारत के प्रथम स्पीकर मौलाना जी.वी. मावलंकर पर लाया गया। विपक्षी नेता सुचेता कृपलानी ने इसे पेश किया। आरोप थे कि स्पीकर ने सदन में निष्पक्षता नहीं बरती। मजबूत बहस के बावजूद प्रस्ताव भारी मतों से गिर गया। मावलंकर अपने पद पर बने रहे।

हुकुम सिंह पर हमला (1966)
1966 में दूसरे स्पीकर हुकुम सिंह के खिलाफ प्रस्ताव आया। उस दौर में राजनीतिक अस्थिरता चरम पर थी। विपक्ष ने पक्षपात का आरोप लगाया, लेकिन प्रस्ताव को समर्थन न मिलने से यह विफल रहा। हुकुम सिंह ने अशांत समय में सदन संभाला।

बलराम जाखड़ मामला (1987)
आठवीं लोकसभा में 1987 के दौरान बलराम जाखड़ के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया। राजनीतिक तनाव चरम पर था, विपक्ष ने कार्यवाही संचालन पर सवाल उठाए। हालांकि, प्रस्ताव को बहुमत न मिला और जाखड़ पद पर जमे रहे। यह पैटर्न दर्शाता है कि ऐसे प्रस्ताव प्रायः प्रतीकात्मक रहते हैं।

वर्तमान संदर्भ में ओम बिरला पर आरोप
17वीं लोकसभा के स्पीकर ओम बिरला (2019 से पद पर) पर विपक्ष का कहना है कि बार-बार व्यवधानों के बीच विपक्ष को दबाया गया। महिला सांसदों की अनदेखी और चुनिंदा बोलने की अनुमति जैसे मुद्दे प्रमुख हैं। विपक्षी नेता राहुल गांधी ने सदन में कई बार इसकी शिकायत की। प्रस्ताव लाने से पहले 14 दिन का नोटिस जरूरी है।

संविधान क्या कहता है?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 94(c) के तहत स्पीकर या डिप्टी स्पीकर को हटाने के लिए लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव लाया जा सकता है। प्रस्ताव कम से कम 50 सांसदों के समर्थन से पेश होता है, लेकिन पास होने के लिए लोकसभा की कुल सदस्यता (543) का बहुमत (272+) चाहिए। 14 दिन का नोटिस अनिवार्य है। स्पीकर प्रस्ताव पर चर्चा का फैसला लेते हैं, लेकिन इसे अस्वीकार नहीं कर सकते यदि शर्तें पूरी हों। यह प्रावधान सदन की निष्पक्षता सुनिश्चित करता है।

इतिहास गवाह है कि स्पीकर के खिलाफ चार मुख्य प्रयास हुए, लेकिन कोई सफल नहीं। वर्तमान प्रस्ताव भी राजनीतिक संदेश देने का हथियार लगता है। लोकसभा सचिवालय जल्द फैसला लेगा।

Correspondent – Shanwaz Khan

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