इस साल भारतीय रुपये में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। साल की शुरुआत से अब तक रुपए में लगभग 5 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई है, जिससे यह एशियाई बाजारों में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में से एक बन गया है। सोमवार को रुपये ने डॉलर के मुकाबले 90 रुपये का स्तर पार कर लिया, जो लंबे समय से एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।
रुपये की कमजोर स्थिति के पीछे कई कारण हैं। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और विदेशी निवेशकों की भारतीय बाजार से लगातार बिकवाली रुपये के दबाव में सबसे बड़ी वजह मानी जा रही हैं। सोमवार की ट्रेडिंग में रुपया 16 पैसे गिरकर 90.11 के स्तर पर पहुंच गया। इसका तुरंत असर घरेलू बाजारों में भी दिखा और आर्थिक विशेषज्ञ इस चुनौती से निपटने को लेकर सतर्क हैं।
हालांकि, हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने बाजार को स्थिर करने के लिए कई कदम उठाए हैं। हाल ही में आरबीआई ने रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की कटौती की है। इसके अलावा, लगभग 1 लाख करोड़ रुपये के ओपन मार्केट बॉन्ड खरीदे गए और डॉलर की कमी को पूरा करने के लिए 5 अरब डॉलर के स्वैप भी किए गए। इन प्रयासों से बाजार को कुछ राहत मिली है, लेकिन यह पूरी तरह स्थिरता के लिए पर्याप्त नहीं माना जा रहा।
अब सभी की नजरें इस सप्ताह होने वाली अमेरिकी फेडरल रिजर्व की बैठक पर हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि 9 और 10 दिसंबर को फेडरल रिजर्व 25 बेसिस पॉइंट की कटौती कर सकता है। इस कदम से वैश्विक बाजारों में मुद्राओं को सहारा मिलेगा और संभावित रूप से रुपये को भी फायदा हो सकता है। हालांकि, कई बाजार जानकारों का कहना है कि फेडरल रिजर्व की कटौती का असर भारतीय रुपया पर सीमित रह सकता है।
इसके अलावा, भारत और अमेरिका के बीच बढ़ते ट्रेड घाटे तथा व्यापारिक समझौते न होने से भी रुपये की कमजोरी दूर होने में बाधा आ रही है। विदेशी निवेशकों का भारतीय बाजार से भरोसे का उठना और निरंतर बेचवाली का दबाव रुपये को कमजोर करता जा रहा है।
इस संदर्भ में विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि विदेशी निवेशकों के विश्वास को बहाल करना और आर्थिक सुधारों को मजबूत करना आवश्यक है ताकि मुद्रा में स्थिरता लाई जा सके। फिलहाल, रुपये की कमजोरी के बीच व्यापारियों और निवेशकों में अनिश्चितता बनी हुई है, और फेडरल रिजर्व की आगामी बैठक से जुड़े फैसलों के प्रति व्यापक सतर्कता जारी है।
Business / Piyush Dhar Diwedi



