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भारत के संविधान निर्माण में 15 वीरांगनाओं का अमर योगदान

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भारत का संविधान लोकतंत्र की मजबूत नींव है, जिसे 1946 में गठित संविधान सभा ने तैयार किया। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बनी इस सभा में शुरू में 389 सदस्य थे, लेकिन विभाजन के बाद 299 रह गए, जिनमें मात्र 15 महिलाएं शामिल थीं। उस दौर में सामाजिक बंधनों के बावजूद इन्होंने शिक्षा, समानता, महिला अधिकार, स्वास्थ्य, मजदूर कल्याण और अल्पसंख्यक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर महत्वपूर्ण बहसें छेड़ीं। इनका योगदान संविधान को समावेशी बनाने में निर्णायक रहा।

प्रमुख महिलाओं का परिचय और योगदान

  • अम्मू स्वामीनाथन: केरल की अम्मू ने महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार दिलाने पर जोर दिया। 1949 के अंतिम भाषण में उन्होंने कहा कि संविधान महिलाओं की बराबरी साबित करेगा।
  • सरोजिनी नायडू: ‘भारत कोकिला’ ने महिलाओं की शिक्षा और राजनीतिक भागीदारी को बढ़ावा दिया। स्वतंत्रता सेनानी के रूप में उन्होंने संविधान सभा में प्रेरक भूमिका निभाई।
  • बेगम ऐजाज रसूल: संविधान सभा की एकमात्र मुस्लिम महिला सदस्य। उन्होंने धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का समर्थन किया।
  • हंसा मेहता: ‘सभी मनुष्य समान जन्मे हैं’ वाले अनुच्छेद को पुरुष-प्रधान भाषा से बदलवाया। महिला सशक्तिकरण की प्रबल पैरोकार रहीं।
  • सुचेता कृपलानी: उत्तर प्रदेश की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं। मजदूर अधिकारों और महिला शिक्षा पर बल दिया।​
  • दुर्गाबाई देशमुख: लड़कियों की शिक्षा और महिला कल्याण योजनाओं की वकालत कीं। आंध्र प्रदेश में समाज सुधार आंदोलन चलाया।
  • विजयलक्ष्मी पंडित: जवाहरलाल नेहरू की बहन। संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली महिला अध्यक्ष बनीं। अंतरराष्ट्रीय छवि और महिला स्थिति पर विचार रखे।
  • राजकुमारी अमृत कौर: स्वतंत्र भारत की पहली स्वास्थ्य मंत्री। स्वास्थ्य सेवाओं और महिला अधिकारों पर विशेष फोकस।
  • एनी मस्कारेन: केरल से। महिलाओं व मजदूरों के अधिकारों की मजबूत वकील। सामाजिक समानता की बात की।​
  • रेणुका रे: कानूनी और आर्थिक सुधारों पर जोर। बंगाल से आंद्रे पूर्व मुख्यमंत्री सी. राजगोपालाचारी की पुत्री।
  • पूर्णिमा बनर्जी: गरीबों और महिलाओं के लिए न्याय की मांग। समान अवसरों की पक्षधर।
  • लीला रॉय: बंगाल की स्वतंत्रता सेनानी। महिला शिक्षा और समाज सुधार में सक्रिय।​
  • मालती चौधरी: ओडिशा से। ग्रामीण विकास, शिक्षा-स्वास्थ्य मुद्दों पर राय रखीं।
  • दक्षायनी वेलायुधन: पहली दलित महिला सदस्य। छुआछूत विरोधी। वंचित वर्गों की आवाज बनीं।
  • कमला चौधरी: संविधान सभा की सूची में शामिल पंजाब प्रतिनिधि। सामाजिक न्याय पर योगदान।

ऐतिहासिक महत्व

ये 15 महिलाएं समाज के हर वर्ग से थीं – ब्राह्मण, दलित, मुस्लिम, राजघराने। 9 दिसंबर 1946 को पहली बैठक से 26 नवंबर 1949 तक चली बहसों में इन्होंने संविधान को प्रगतिशील बनाया। 24 नवंबर 1949 को हस्ताक्षर अभियान में भी सक्रिय रहीं। आजादी के बाद ये कई मंत्रिमंडलों में शामिल हुईं। इनका बलिदान हमें समानता का संदेश देता है।

Correspondent – Shanwaz Khan

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