अमेठी/लखनऊ: उत्तर प्रदेश को बांटने की पुरानी मांग एक बार फिर जोर पकड़ रही है। बुधवार (21 जनवरी 2026) को अमेठी जिले के ददन सदन में आयोजित खिचड़ी भोज एवं स्नेह मिलन कार्यक्रम में बीजेपी के दो प्रमुख नेताओं—पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. संजय सिंह और पूर्व प्राविधिक शिक्षा मंत्री डॉ. अमीता सिंह—ने पूर्वांचल राज्य गठन की मांग को स्पष्ट शब्दों में दोहराया। हजारों लोगों की मौजूदगी में उन्होंने कहा कि 28 जिलों को मिलाकर अलग राज्य बनना पूर्वांचल का हक है। यह मांग बीजेपी के लिए दुविधा पैदा कर सकती है, क्योंकि सीएम योगी आदित्यनाथ खुद राज्य बंटवारे के खिलाफ रहे हैं।
कार्यक्रम में गूंजी मांग, नेताओं का खुला ऐलान
ददन सदन में आयोजित कार्यक्रम पूर्वांचल राज्य संयुक्त संकल्प मंच का हिस्सा था। डॉ. संजय सिंह ने मंच से कहा, “उत्तर प्रदेश देश का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है, जहां 24 करोड़ से ज्यादा लोग रहते हैं। एक ही प्रशासनिक ढांचे में सुशासन देना असंभव हो गया है। पूर्वांचल के 8 मंडलों के 28 जिलों को अलग कर नया राज्य बनाएं—वाराणसी, चंदौली, जौनपुर, गाजीपुर, आजमगढ़, मऊ, बलिया, प्रयागराज, कौशाम्बी, प्रतापगढ़, मिर्जापुर, सोनभद्र, भदोही, अयोध्या, अकबरपुर, सुल्तानपुर, अमेठी, गोंडा, बलरामपुर, बहराइच, श्रावस्ती, गोरखपुर, महाराजगंज, देवरिया, कुशीनगर, बस्ती, सिद्धार्थनगर और संत कबीर नगर।”
उन्होंने बताया कि यह प्रस्तावित राज्य लगभग 8 करोड़ आबादी वाला होगा, जो देश का 14वां सबसे बड़ा राज्य बनेगा। डॉ. सिंह का दावा है कि 2027 के चुनाव से पहले यह हकीकत बन जाएगा। कार्यक्रम में बीजेपी के पूर्व जिला अध्यक्ष रामप्रसाद मिश्रा, एडवोकेट उमाशंकर पांडेय, पूर्व विधायक तेजभान सिंह, एमएलसी शैलेंद्र प्रताप सिंह, नेता चंद्र प्रकाश मिश्र और आरएसएस प्रचारक पवन मौजूद रहे।
पूर्वांचल की उपेक्षा का इतिहास: क्यों उठ रही मांग?
पूर्वांचल की मांग नई नहीं है। 1950 के दशक से ही यह चर्चा में है। 1990 के दशक में मुलायम सिंह यादव सरकार ने उत्तर प्रदेश को तीन हिस्सों—पश्चिमी यूपी, अवध प्रदेश और पूर्वांचल—में बांटने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन केंद्र ने खारिज कर दिया। 2000 में उत्तरांचल (अब उत्तराखंड) अलग हुआ, लेकिन पूर्वांचल की बारी नहीं आई।
क्षेत्र की समस्याएं गंभीर हैं। एबीपी न्यूज से बातचीत में डॉ. अमीता सिंह ने कहा, “पूर्वांचल की भाषाई-सांस्कृतिक पहचान भोजपुरी-मगही है, जो हिंदी पट्टी से अलग है। उपजाऊ भूमि, खनिज संपदा (सोनभद्र-मिर्जापुर), बिजली उत्पादन और पर्यटन (अयोध्या, काशी, प्रयागराज, सारनाथ, कुशीनगर) के बावजूद पलायन रोकना मुश्किल है। बाढ़-सूखा, खराब स्वास्थ्य-शिक्षा और उद्योगों की कमी ने इसे पिछड़ा बना दिया।” उन्होंने भावुक अपील की, “मुंबई, सूरत, दुबई में पूर्वांचली मेहनत कर रहे हैं। हमें राज्य दो, हम भारत को जापान बना देंगे।”
संयुक्त मंच से मुहिम, एकजुटता का आह्वान
डॉ. संजय सिंह ने ‘पूर्वांचल राज्य संयुक्त संकल्प मंच’ की घोषणा की। सभी संगठनों से एकजुट होने को कहा गया। मंच राज्य गठन के लिए जनमत संग्रह, धरना-प्रदर्शन और दिल्ली में लॉबिंग करेगा। पश्चिमी यूपी में भी हरित प्रदेश की मांग तेज है, जो बीजेपी के लिए चुनौती है।
बीजेपी में फूट? योगी का पुराना विरोध
यह मांग बीजेपी के लिए घिरी हुई है। सीएम योगी ने 2022 में कहा था, “यूपी एकजुट रहेगा। इसमें अपार संभावनाएं हैं। बंटवारा कमजोरी लाएगा।” हाल ही में पश्चिमी यूपी के बीजेपी नेताओं ने भी बंटवारे की बात कही। राजनीतिक विश्लेषक डॉ. अनिल यादव कहते हैं, “यह स्थानीय असंतोष है, लेकिन पार्टी लाइन से टकराव हो सकता है। 2027 चुनाव में वोट बैंक प्रभावित होगा।”
आर्थिक प्रभाव: नया राज्य बने तो क्या?
प्रस्तावित पूर्वांचल का क्षेत्रफल 1.2 लाख वर्ग किमी होगा। जीडीपी में योगदान 10-12%। खनन, पर्यटन और कृषि से राजस्व बढ़ेगा। लेकिन चुनौतियां—कर्ज, सीमांकन विवाद। विशेषज्ञों का मानना है कि छोटे राज्य बेहतर शासन देते हैं, जैसे छत्तीसगढ़-झारखंड।
विपक्ष की प्रतिक्रिया और भविष्य
सपा-बसपा ने मांग का समर्थन किया, लेकिन योगी सरकार चुप्पी साधे है। यदि मांग तेज हुई तो संसद में बिल लाना पड़ेगा। 2027 चुनाव पूर्व यह मुद्दा गरमाएगा। पूर्वांचल के लोग विकास चाहते हैं—क्या बंटवारा समाधान है या एकता में ताकत?
Correspondent – Shanwaz khan



