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क्या रूस की जगह अब वेनेजुएला लेगा? भारत को कच्चे तेल पर अमेरिका का नया ऑफर

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आपके दिए हुए कंटेंट के आधार पर मैं इसी विषय पर लगभग 450 शब्दों की नई हिंदी न्यूज़ स्टोरी और नया हेडलाइन बना रहा हूँ (कॉपी नहीं, बदला हुआ ड्राफ्ट):


क्या रूस की जगह अब वेनेजुएला लेगा? भारत को कच्चे तेल पर अमेरिका का नया ऑफर

भारत की ऊर्जा रणनीति एक बार फिर वैश्विक राजनीति के केंद्र में आ गई है। अमेरिका ने संकेत दिया है कि नई दिल्ली चाहें तो वह वेनेजुएला से कच्चे तेल की खरीद फिर से शुरू कर सकती है और इसे रूसी तेल के विकल्प के रूप में इस्तेमाल कर सकती है। यह प्रस्ताव ऐसे समय आया है, जब भारत धीरे‑धीरे रूस से होने वाले तेल आयात में कटौती की तैयारी कर रहा है।

सूत्रों के मुताबिक, वॉशिंगटन ने भारतीय अधिकारियों को अनौपचारिक रूप से बताया है कि वेनेजुएला के तेल पर लगी पाबंदियों के रुख में नरमी संभव है, ताकि रूस से घटती आपूर्ति की भरपाई की जा सके। लक्ष्य यह है कि रूस की तेल आय से होने वाली कमाई को सीमित किया जाए, क्योंकि माना जाता है कि यही आय मॉस्को को यूक्रेन युद्ध जारी रखने में मदद कर रही है।

यह पूरा मामला मार्च 2025 के फैसलों से जुड़ा है। उस समय डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने भारत सहित वेनेजुएला से तेल खरीदने वाले कई देशों पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया था। इसके अलावा, 3 जनवरी 2026 को अमेरिकी सेना द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी के बाद दोनों देशों के संबंध और जटिल हो गए। अब वही वॉशिंगटन, अपने रुख में बदलाव का संकेत देता दिख रहा है और भारत को वेनेजुएला से आयात फिर शुरू करने के लिए हरी झंडी देने की तैयारी कर रहा है।

भारत ने 2022 के बाद से रूस से रियायती कच्चे तेल की बड़े स्तर पर खरीद की थी। पश्चिमी देशों की पाबंदियों और भारी डिस्काउंट के चलते भारत रूस का प्रमुख ग्राहक बनकर उभरा। लेकिन इसके जवाब में ट्रंप प्रशासन ने भारतीय उत्पादों पर आयात शुल्क बढ़ा दिया और रूसी तेल से जुड़े सौदों पर लगने वाले 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ को मिलाकर कुल कर दर लगभग 50 प्रतिशत तक पहुंच गई। इससे भारतीय रिफाइनरियों पर लागत का दबाव बढ़ा और सरकार पर सोर्स डायवर्सिफिकेशन (आपूर्ति के स्रोतों को विविध बनाने) का दबाव तेज हुआ।

रॉयटर्स के हवाले से मिली जानकारी के अनुसार, भारत रूस से कच्चे तेल के आयात को 10 लाख बैरल प्रतिदिन से नीचे लाने की तैयारी कर रहा है। जनवरी में यह आयात करीब 12 लाख बैरल प्रतिदिन था, जो फरवरी में घटकर लगभग 10 लाख बैरल और मार्च में अनुमानित रूप से 8 लाख बैरल प्रतिदिन रह सकता है। यह ट्रेंड दिखाता है कि रूस पर भारत की निर्भरता धीरे‑धीरे कम हो रही है।

अब सवाल यह है कि वेनेजुएला का तेल भारत तक किस माध्यम से पहुंचेगा। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि सप्लाई विटोल, ट्राफिगुरा जैसे अंतरराष्ट्रीय ट्रेडिंग हाउस के ज़रिए होगी या सीधे वेनेजुएला की सरकारी तेल कंपनी पीडीवीएसए भारत की रिफाइनरियों को बेचेगी। किसी भी मॉडल पर सहमति बनने से पहले अमेरिकी प्रतिबंधों, बीमा, भुगतान व्यवस्था और शिपिंग कॉस्ट जैसे मुद्दों पर साफ तस्वीर बनना जरूरी होगा।

भारत के लिए चुनौती यह है कि वह सस्ती आपूर्ति, ऊर्जा सुरक्षा और भू‑राजनीतिक संतुलन—तीनों के बीच संतुलित रास्ता चुने। अमेरिका के नए संकेत के बाद साफ है कि आने वाले महीनों में भारत की तेल खरीद नीति में बड़ा बदलाव देखा जा सकता है।

Correspondent – Shanwaz Khan

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