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एंटी-बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम: भारत-इजरायल का नया सहयोग कैसे बदलेगा हवाई सुरक्षा का परिदृश्य

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नई दिल्ली, 22 फरवरी 2026: बदलते वैश्विक युद्ध परिदृश्य में भारत और इजरायल एक साथ मिलकर एंटी-बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस (ABMD) सिस्टम विकसित करने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आगामी इजरायल दौरे (25-26 फरवरी) से पहले यह संयुक्त परियोजना हवाई खतरों से निपटने की भारत की क्षमता को अभूतपूर्व स्तर पर मजबूत कर सकती है। आइए विस्तार से समझें कि यह सिस्टम कैसे काम करता है, इसकी तकनीक क्या है और भारत के लिए इसका क्या महत्व है।

ABMD सिस्टम क्या है और कैसे काम करता है?

एंटी-बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम एक बहु-स्तरीय सुरक्षा कवच है, जो शत्रु की बैलिस्टिक मिसाइलों को लॉन्च होते ही ट्रैक कर हवा में ही नष्ट कर देता है। बैलिस्टिक मिसाइलें तीन चरणों में काम करती हैं: बूस्टर चरण (लॉन्च), मिड-कोर्स चरण (उच्च ऊंचाई पर पैराबॉलिक उड़ान) और टर्मिनल चरण (लक्ष्य पर तेजी से उतरना)। ABMD इन्हें मिड-कोर्स या टर्मिनल चरण में ही रोकता है।

इस सिस्टम के मुख्य घटक हैं:

  • उन्नत रडार सिस्टम: लॉन्ग रेंज ट्रैकिंग रडार (LRTR) और मल्टी-फंक्शन रडार (MFR) दुश्मन मिसाइल को 1000-5000 किमी दूर से डिटेक्ट करते हैं। ये रडार मिसाइल की गति (मच 5-20), ऊंचाई (50-150 किमी) और ट्रैजेक्टरी की गणना करते हैं।
  • कमांड एंड कंट्रोल सेंटर: खतरे का मूल्यांकन कर इंटरसेप्टर लॉन्च का निर्णय लेता है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लैस यह सेंटर ‘हिट-टू-किल’ तकनीक अपनाता है, जिसमें इंटरसेप्टर सीधे टकराकर मिसाइल को विखंडित कर देता है—कोई विस्फोटक नहीं, सिर्फ काइनेटिक ऊर्जा।
  • इंटरसेप्टर मिसाइलें: दो-स्तरीय संरचना—एक्सो-एटमॉस्फेरिक (वायुमंडल से बाहर, 80-150 किमी ऊंचाई) जैसे PDV (Prithvi Defence Vehicle) और एंडो-एटमॉस्फेरिक (वायुमंडल में, 15-40 किमी) जैसे AD-1/AD-2। ये हाइपरसोनिक गति से उड़कर 90-99% सफलता दर हासिल करती हैं।

भारत का स्वदेशी BMD कार्यक्रम (DRDO द्वारा) पहले से फेज-1 (2000 किमी रेंज) और फेज-2 (5000 किमी) पर काम कर रहा है। 2025 तक कई सफल टेस्ट हो चुके हैं, जो पाकिस्तान/चीन की मिसाइलों को रोक सकते हैं।

भारत-इजरायल सहयोग की पृष्ठभूमि

पीएम मोदी का दौरा रक्षा साझेदारी को नई ऊंचाई देगा। चर्चा में ABMD के जॉइंट डेवलपमेंट, लॉन्ग रेंज स्टैंड-ऑफ मिसाइलें (LRSAM), एडवांस्ड ड्रोन और लेजर हथियार शामिल हैं। भारत पहले इजरायल से बराक-8, स्पाइडर और फाल्कन AWACS ले चुका है। यह साझा परियोजना भारत को अमेरिका, रूस, इजरायल की तरह पूर्ण मिसाइल शील्ड देगी।

इजरायल का आयरन बीम: लेजर तकनीक की ताकत

इजरायल का आयरन बीम (दिसंबर 2025 में तैनात) लेजर-आधारित डिफेंस है, जो पारंपरिक इंटरसेप्टर्स से श्रेष्ठ है। यह प्रकाश की गति (3 लाख किमी/सेकंड) से हमला करता है—मिसाइलों के 10-30 सेकंड लगते हैं, लेजर तुरंत असर दिखाता है। लागत मात्र 2 डॉलर प्रति शॉट (इंटरसेप्टर: 10 लाख डॉलर)। बिजली से चलने वाला यह सिस्टम ड्रोन स्वार्म, रॉकेट, मोर्टार को पिन-पॉइंट सटीकता से भस्म कर देता है। हमास/हिजबुल्लाह जैसे खतरों के खिलाफ इसका 100+ सफल परीक्षण हो चुका है। भारत के लिए यह सस्ता, अनलिमिटेड ‘गोला-बारूद’ साबित होगा।

आधुनिक चुनौतियां और भारत की जरूरत

आज ड्रोन स्वार्म, हाइपरसोनिक मिसाइलें (चीन की DF-17) और सैचुरेशन अटैक (एक साथ सैकड़ों मिसाइलें) प्रमुख खतरे हैं। S-400, अकाश-NG जैसे भारत के मौजूदा सिस्टम अच्छे हैं, लेकिन ABMD+लेजर इंटीग्रेशन से बहु-परत सुरक्षा बनेगी। पड़ोसी देशों की 100+ बैलिस्टिक मिसाइलें (पाक: शाहीन-3, चीन: DF-41) भारत के लिए सीधा खतरा हैं। यह सिस्टम दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों को शील्ड देगा।

भविष्य की संभावनाएं और चुनौतियां

संयुक्त विकास से भारत ‘आत्मनिर्भर भारत’ को मजबूत करेगा—DRDO+IAI का मेल तकनीकी ट्रांसफर सुनिश्चित करेगा। चुनौतियां: हाइपरसोनिक इंटरसेप्शन, साइबर थ्रेट्स और लागत (50,000 करोड़+ अनुमानित)। फिर भी, यह कदम भारत को एशिया का सबसे सुरक्षित देश बनाएगा। वैश्विक तनाव (उक्रेन, ताइवान) में मिसाइल डिफेंस रणनीतिक श्रेष्ठता का प्रतीक है। पीएम मोदी का दौरा न सिर्फ डील फाइनलाइज करेगा, बल्कि Indo-Israel डिफेंस कॉरिडोर को नई गति देगा। आने वाले वर्षों में भारत की हवाई सीमा अभेद्य हो जाएगी, जो शांति और स्थिरता का आधार बनेगी।

Correspondent – Shanwaz Khan

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