नई दिल्ली: आधुनिक दुनिया में जहां टेलीविजन घर-घर की शान बन चुका था, वहां एक देश ने इसे जानबूझकर ठुकरा दिया। भूटान, हिमालय की गोद में बसा यह छोटा सा साम्राज्य, आधुनिक इतिहास का आखिरी देश था जिसने टेलीविजन शुरू किया। 1960-70 के दशक में जब पूरी दुनिया टीवी की चकाचौंध में डूब रही थी, भूटान ने 1999 तक इससे दूरी बनाए रखी। यह बैन तकनीकी कमी या गरीबी की वजह से नहीं, बल्कि अपनी अनूठी संस्कृति, बौद्ध मूल्यों और सामाजिक संतुलन को बचाने के लिए था। आइए जानते हैं इस फैसले की पूरी कहानी।
संस्कृति और परंपराओं को विदेशी प्रभाव से बचाने का डर
भूटान की सरकार को चिंता थी कि पश्चिमी मीडिया—हॉलीवुड फिल्में, वेस्टर्न शोज और विज्ञापन—युवाओं को आकर्षित कर स्थानीय परंपराओं को मिटा देंगे। यहां बौद्ध धर्म जीवन का आधार है, जहां द्रुकपा काग्यू परंपरा, राष्ट्रीय वेशभूषा (घो) और सामुदायिक उत्सव प्रमुख हैं। राजा जिग्मे सिंग्ये वांगचुक ने कहा था, “हम आधुनिकीकरण चाहते हैं, लेकिन पश्चिमीकरण नहीं।” ग्लोबलाइजेशन की लहर में भूटान ने ‘ग्रॉस नेशनल हैप्पनेस’ (GNH) मॉडल अपनाया, जो GDP से ज्यादा खुशी, पर्यावरण और सांस्कृतिक संरक्षण पर जोर देता है। टीवी को ‘सांस्कृतिक आक्रमण’ मानकर बैन किया गया, ताकि परिवारों में मौखिक कथाएं, नृत्य और ध्यान की परंपरा बनी रहे।
बैन की सख्ती: एंटीना तोड़ने से लेकर निगरानी तक
बैन कोई कागजी था नहीं। 1989 में सरकार ने देशभर में सैटेलाइट डिश और टीवी एंटीना हटाने का आदेश दिया। पाए गए उपकरण नष्ट कर दिए गए। सीमा पर तस्करी रोकने के लिए सख्त निगरानी रखी गई। इससे भूटान वैश्विक ब्रॉडकास्ट से कटा रहा। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह फैसला सामाजिक एकता बनाए रखने में सफल रहा—तलाक की दर कम रही, अपराध न्यूनतम और पर्यावरण संरक्षित।
1999 में बैन हटने की कहानी: फीफा वर्ल्ड कप से शुरुआत
आखिरकार, जून 1999 में चौथे ड्रुक ग्याल्पो जिग्मे सिंग्ये वांगचुक ने बैन हटाया। यह नियोजित कदम था, जो BBS (भूटान ब्रॉडकास्टिंग सर्विस) के लॉन्च से शुरू हुआ। पहला बड़ा प्रसारण 1998 फीफा वर्ल्ड कप फाइनल था—फ्रांस बनाम ब्राजील। थिम्पू के बड़े स्क्रीन पर हजारों ने इसे देखा, जो टीवी क्रांति का प्रतीक बना। इंटरनेट भी उसी समय आया, लेकिन सेंसरशिप के साथ। आज भूटान में 70% से ज्यादा टीवी कवरेज है, लेकिन स्थानीय कंटेंट को प्राथमिकता मिलती है।
आज का भूटान: संतुलन की मिसाल
भूटान ने साबित किया कि तकनीक को नियंत्रित कर संस्कृति बचाई जा सकती है। GNH आज भी नीति का आधार है। यह कहानी हमें सोचने पर मजबूर करती है—क्या हमारी संस्कृति डिजिटल बाढ़ में डूब रही है? भूटान की तरह सतर्कता ही रास्ता है।
Correspondent – Shanwaz Khan



