नई दिल्ली। वैश्विक ऊर्जा राजनीति में भारत का रुख तेजी से बदल रहा है। अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने बड़ा खुलासा करते हुए कहा कि भारत रूसी तेल पर निर्भरता कम करने के लिए नए विकल्प तलाश रहा है और वेनेजुएला से कच्चा तेल खरीदने को लेकर सक्रिय बातचीत चल रही है। इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 के दौरान रॉयटर्स को दिए इंटरव्यू में गोर ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “भारत तेल खरीद के विकल्पों में विविधता ला रहा है। अमेरिका किसी भी देश को रूसी तेल खरीदने से रोकना चाहता है, क्योंकि राष्ट्रपति ट्रंप यूक्रेन युद्ध को शांत करने के लिए दृढ़ हैं।”
यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत शुक्रवार (20 फरवरी 2026) को अमेरिका के नेतृत्व वाले ‘पैक्स सिलिका’ रणनीतिक गठबंधन में शामिल हुआ। गोर ने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर भी अपडेट दिया, “ट्रेड डील पर जल्द हस्ताक्षर होंगे। टैरिफ 50% से घटकर 18% रहेंगे, जो दोनों लोकतंत्रों के बीच विकास की प्रतिबद्धता दर्शाता है। विदेश मंत्री मार्को रुबियो का भारत दौरा भी तय है।” उन्होंने जोर देकर कहा कि यह डील केवल व्यापार तक सीमित नहीं, बल्कि रक्षा, तकनीक और ऊर्जा सुरक्षा पर केंद्रित है।
रूस के सस्ते तेल ने पिछले दो वर्षों में भारत की ऊर्जा जरूरतों को संभाला था, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों और ट्रंप प्रशासन के दबाव के बाद स्थिति बदल रही है। राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया कि भारत रूसी तेल आयात पूरी तरह बंद करने को सहमत है, हालांकि भारत ने आधिकारिक इनकार किया। विदेश मंत्रालय ने कहा, “हम जनहित में सस्ता तेल खरीदेंगे, लेकिन विविधीकरण पर काम जारी है।” रूस ने भी सफाई दी कि नई दिल्ली से कोई औपचारिक सूचना नहीं मिली। फिर भी, जनवरी 2026 में भारत का रूस से आयात 40% घटकर 2.86 अरब डॉलर रह गया।
वेनेजुएला विकल्प क्यों आकर्षक? अमेरिकी प्रतिबंधों से पहले भारत इसकी भारी कच्चे तेल का बड़ा खरीदार था, जो रिलायंस, BPCL जैसी रिफाइनरियों के लिए उपयुक्त है। व्हाइट हाउस ने संकेत दिया कि ‘नियंत्रित फ्रेमवर्क’ के तहत भारत को 5 करोड़ बैरल वेनेजुएला तेल उपलब्ध कराया जा सकता है। BPCL और HPCL मित्तल ने पहले ही 10 लाख बैरल का आयात शुरू कर दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम रूस-यूक्रेन युद्ध की फंडिंग रोकेगा और भारत-अमेरिका संबंधों को मजबूत करेगा।
भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर गहरा होगा। रूसी तेल सस्ता था, लेकिन वेनेजुएला और अमेरिकी स्रोत महंगे पड़ सकते हैं, जिससे पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने का खतरा है। विपक्ष ने सरकार पर सवाल उठाए, “राष्ट्रीय हित क्यों दांव पर?” वहीं, उद्योगपति बोफोर्स जैसे सौदों की याद दिलाते हुए ट्रेड डील का स्वागत कर रहे हैं। क्या यह भारत की ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ नीति का अंत है? आने वाले हफ्तों में रुबियो दौरे से साफ हो जाएगा। फिलहाल, ऊर्जा बाजार में उथल-पुथल मची हुई है।
Correspondent – Shanwaz Khan



