केंद्र की मंजूरी से केरल का नया नाम
यूनियन कैबिनेट ने केरल का नाम आधिकारिक रूप से ‘केरलम’ करने का पुराना प्रस्ताव मंजूर कर लिया। यह फैसला राज्य विधानसभा चुनाव से ठीक पहले आया, जो राजनीतिक रूप से अहम है। लेकिन राज्य नाम बदलना न आसान है, न सस्ता। पिछले मामलों से साफ है कि इसमें 200 से 500 करोड़ रुपये तक खर्च हो सकता है। सिर्फ साइनबोर्ड बदलना काफी नहीं; पूरा प्रशासनिक तंत्र प्रभावित होता है।
खर्च के मुख्य स्रोत
राज्य नाम परिवर्तन का असर राष्ट्रीय स्तर पर पड़ता है। सबसे बड़ा खर्च इंफ्रास्ट्रक्चर अपडेट पर:
- साइनेज और बोर्ड: हाईवे, रोड साइन, रेलवे स्टेशन, एयरपोर्ट, सरकारी भवन- सभी बदलें। 1995 में बॉम्बे से मुंबई बदलने पर रेलवे ने अकेले 2.5 करोड़ साइन और टिकट पर खर्च किए।
- स्टेशनरी व रिकॉर्ड: लेटरहेड, सील, आईडी कार्ड, आर्काइव फाइलें। राज्य-केंद्र के हजारों दफ्तर प्रभावित।
- डिजिटल सिस्टम: वेबसाइट, लैंड रिकॉर्ड, जीआईएस मैप, नेविगेशन ऐप (गूगल मैप्स), टैक्स पोर्टल, पोस्टल कोड। सॉफ्टवेयर अपग्रेड महंगा।
- प्राइवेट सेक्टर: बैंक, बिजनेस, स्कूल, कंपनियां- कॉन्ट्रैक्ट, ब्रांडिंग, पैकेजिंग अपडेट।
इलाहाबाद से प्रयागराज (2018) पर उत्तर प्रदेश ने 300 करोड़ से ज्यादा खर्चे का अनुमान। मदुरै, बैंगलोर जैसे शहर बदलावों में भी करोड़ों लगे।
संवैधानिक प्रक्रिया
संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत प्रक्रिया सख्त:
- राज्य विधानसभा प्रस्ताव पारित कर केंद्र भेजे।
- गृह मंत्रालय रेल, डाक, खुफिया एजेंसियों से रिपोर्ट ले।
- संसद में बिल पेश, दोनों सदनों से साधारण बहुमति।
- राष्ट्रपति की मंजूरी से नाम बदलाव।
केरल विधानसभा ने 2025 में प्रस्ताव पास किया था। अब केंद्र की मंजूरी से ‘केरलम’ मलयालम उच्चारण पर जोर।
राजनीतिक व सामाजिक प्रभाव
नाम बदलाव अक्सर सांस्कृतिक पहचान से जुड़े। लेकिन खर्च पर सवाल उठते हैं। विपक्ष इसे चुनावी स्टंट बताता। विकास कार्यों पर असर पड़ सकता। फिर भी, केरलम से पर्यटन और ब्रांडिंग मजबूत हो सकती। कुल मिलाकर, यह फैसला लंबे इंतजार का नतीजा।
Correspondent – Shanwaz Khan



