मादक पदार्थों का दुरुपयोग आज वैश्विक स्तर पर एक गंभीर चुनौती बन चुका है, जो युवाओं के भविष्य, परिवारों की एकता और समाज की प्रगति को नष्ट कर रहा है। भारत में भी नशे की लत ने लाखों जिंदगियों को तबाह कर दिया है, लेकिन अब समय आ गया है कि सीमाओं से परे एकजुट होकर इस बुराई का सामना किया जाए। अंतरराष्ट्रीय मादक पदार्थ निषेध दिवस (26 जून) जैसे अवसरों पर सरकारें, एनजीओ और आम नागरिक मिलकर जागरूकता फैला रहे हैं, ताकि नशा मुक्त भारत का सपना साकार हो सके।
नशे का बढ़ता खतरा
भारत में मादक पदार्थों की तस्करी और दुरुपयोग तेजी से फैल रहा है। एनसीबी (नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो) की रिपोर्ट्स के अनुसार, पिछले वर्षों में जब्ती और गिरफ्तारियां बढ़ी हैं, फिर भी समस्या जड़ से बनी हुई है। युवा वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित है, जहां गांजा, हेरोइन, सynthetic ड्रग्स जैसे अफीम और कोकीन का सेवन अपराध, मानसिक स्वास्थ्य संकट और मृत्यु का कारण बन रहा है। हरियाणा जैसे राज्यों में राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय ने नशे को सामाजिक ताने-बाने के लिए खतरा बताया है, जो राष्ट्रीय प्रगति को रोकता है।
यह समस्या केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं, बल्कि अपराध सिंडिकेट्स से जुड़ी है। संगठित गिरोह सीमाओं को पार कर तस्करी करते हैं, जिससे आर्थिक नुकसान के साथ-साथ सामाजिक विघटन होता है। हिमाचल प्रदेश में शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर ने स्कूलों में जागरूकता अभियान चलाने पर जोर दिया, ताकि बच्चे नशे के दुष्प्रभावों से दूर रहें।
एकजुटता की आवश्यकता
इस लड़ाई में सीमाओं से परे एकजुटता जरूरी है। सरकार ने एनडीपीएस एक्ट 1985 के तहत शून्य सहनशीलता नीति अपनाई है, जिसमें जब्ती और कार्रवाई में वृद्धि हुई। लेकिन कानून प्रवर्तन के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और सामुदायिक भागीदारी भी महत्वपूर्ण हैं। पीआईबी के अनुसार, नशा मुक्त भारत अभियान जन आंदोलन बन रहा है, जहां परिवार, स्कूल और एनजीओ मिलकर काम कर रहे हैं।
वैश्विक स्तर पर संयुक्त राष्ट्र के सम्मेलनों ने ड्रग्स पर प्रतिबंध लगाया, जिसका भारत अनुपालन करता है। हेल्पलाइन, योग, खेलकूद और काउंसलिंग जैसे उपायों से मांग कम की जा सकती है। पुलिस अभियानों में 200 से अधिक गिरफ्तारियां हो चुकी हैं, लेकिन दीर्घकालिक समाधान सामूहिक प्रयासों से ही संभव है।
समाधान के रास्ते
नशे के खिलाफ बहुआयामी रणनीति अपनानी होगी। स्कूल पाठ्यक्रम में नशा जागरूकता अनिवार्य हो, मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन स्थापित हों और पुनर्वास केंद्र बढ़ें। युवाओं को खेल, शिक्षा और रोजगार से जोड़ना जरूरी है। सरकार, एनजीओ और नागरिक समाज का समन्वय ही इस समस्या का स्थायी हल देगा।
अंततः, नशा मुक्त समाज का निर्माण हर नागरिक की जिम्मेदारी है। सीमाओं से परे एकजुट होकर हम इस खतरे को समाप्त कर सकते हैं, ताकि आने वाली पीढ़ियां स्वस्थ और समृद्ध भारत बनाएं। आइए, आज से ही संकल्प लें—नशा मुक्त भारत के लिए!
Correspondent – Shanwaz Khan



