सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा झटका देते हुए इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) के तहत लगाए गए टैरिफ को असंवैधानिक घोषित कर रद्द कर दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि टैरिफ लगाने का अधिकार सिर्फ कांग्रेस के पास है, राष्ट्रपति के पास नहीं। Learning Resources, Inc. v. Trump मामले में यह फैसला आया। प्रशासन का दावा था कि आपातकाल में व्यापक आर्थिक कदम उठाए जा सकते हैं, लेकिन जजों ने इसे खारिज कर दिया। टैरिफ को टैक्स मानते हुए कोर्ट ने संविधान का हवाला दिया। अब सवाल है: अगर डोनाल्ड ट्रंप जैसे राष्ट्रपति फैसले को न मानें तो क्या होगा? अमेरिकी संविधान में शक्तियों का सख्त बंटवारा है।
टैरिफ विवाद का पूरा बैकग्राउंड
यह मामला व्यापार युद्ध से जुड़ा है। ट्रंप प्रशासन ने IEEPA का सहारा लेकर चीन और अन्य देशों पर टैरिफ लगाए थे। दावा किया गया कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आपातकालीन शक्तियां इस्तेमाल की जा रही हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में स्पष्ट किया कि आपातकालीन कानून राष्ट्रपति को असीमित व्यापारिक अधिकार नहीं देते। जजों ने मेजर क्वेश्चन डॉक्ट्रिन का जिक्र किया, जो कहता है कि बड़े आर्थिक फैसलों के लिए स्पष्ट संसदीय मंजूरी जरूरी। शांति काल में राष्ट्रपति के पास टैरिफ लगाने की कोई स्वाभाविक शक्ति नहीं। यह फैसला व्यापार नीति में नया दौर शुरू कर सकता है।
अमेरिकी संविधान में शक्तियों का बंटवारा
अमेरिकी संविधान तीन अंगों- कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका- के बीच साफ विभाजन करता है:
- कांग्रेस (विधायिका): कानून बनाती है। संविधान के आर्टिकल 1 में टैक्स, टैरिफ और व्यापार विनियमन का अधिकार दिया गया। वे बजट और आय के स्रोत तय करती हैं।
- राष्ट्रपति (कार्यपालिका): आर्टिकल 2 के तहत कानूनों को लागू करता है। विदेश नीति और कमांडर-इन-चीफ के रूप में भूमिका, लेकिन टैक्स का अधिकार नहीं।
- न्यायपालिका: आर्टिकल 3 में सुप्रीम कोर्ट को कानूनों की व्याख्या का अधिकार। वे तय करते हैं कि कोई कदम संवैधानिक है या नहीं। मार्बरी व. मैडिसन (1803) मामले से ‘जुडिशियल रिव्यू’ की ताकत मिली।
कोर्ट ने दोहराया कि राष्ट्रपति कांग्रेस के कानूनों से बंधे हैं। IEEPA जैसी सामान्य भाषा वाले कानून बड़े बदलावों के लिए काफी नहीं।
राष्ट्रपति सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट सकते हैं?
नहीं। सुप्रीम कोर्ट का फैसला देशव्यापी बाध्यकारी होता है। राष्ट्रपति कार्यकारी आदेश से इसे ओवरराइड नहीं कर सकता। अगर ट्रंप दोबारा टैरिफ लगाने की कोशिश करें, तो यह संवैधानिक उल्लंघन होगा। पुराने फैसले को बदलने का अधिकार सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के पास। नया मामला आने पर वे पुनर्विचार कर सकते हैं, लेकिन वर्तमान फैसला अंतिम। राष्ट्रपति उसी आधार पर दोहरा कदम नहीं उठा सकते।
फैसला न मानने पर क्या एक्शन?
सुप्रीम कोर्ट के पास अपनी पुलिस या सेना नहीं, लेकिन फैसले अनिवार्य हैं। अगर राष्ट्रपति खुले तौर पर न मानें, तो संवैधानिक संकट पैदा होता है:
- कांग्रेस का हस्तक्षेप: प्रतिनिधि सभा महाभियोग (Impeachment) शुरू कर सकती। सीनेट ट्रायल करेगी। दो-तिहाई बहुमत से दोषी ठहराने पर हटाया जा सकता।
- अवमानना (Contempt): निचली अदालतें अवमानना केस चला सकतीं, लेकिन राष्ट्रपति के खिलाफ मुश्किल।
- राजनीतिक दबाव: कांग्रेस फंडिंग रोक सकती या नए कानून बना सकती। इतिहास में एंड्र्यू जैक्सन ने कोर्ट फैसले को नजरअंदाज किया, लेकिन संकट बढ़ा।
- चुनावी परिणाम: जनता और मीडिया का दबाव।
ऐसे हालात दुर्लभ, क्योंकि सिस्टम चेक एंड बैलेंस पर टिका।
राष्ट्रपति के बचे रास्ते
फैसला IEEPA तक सीमित। अन्य विकल्प:
- कांग्रेस से नया कानून: स्पष्ट टैरिफ अनुमति वाला बिल पास कराएं।
- अन्य कानून: सेक्शन 232 (राष्ट्रीय सुरक्षा) या 301 (अनुचित व्यापार) का इस्तेमाल, लेकिन सीमित।
- व्यापार समझौते: द्विपक्षीय डील्स से टैरिफ प्रभाव।
- नए सुप्रीम कोर्ट जज: अपॉइंटमेंट से लॉन्ग-टर्म प्रभाव, लेकिन मौजूदा फैसला नहीं बदलता।
यह फैसला ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति को चुनौती। कांग्रेस को अब व्यापार में ज्यादा भूमिका। वैश्विक बाजार पर असर पड़ेगा, खासकर चीन-अमेरिका ट्रेड वॉर में।
Correspondent – Shanwaz Khan



